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(आभार राजस्थान पत्रिका)

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राजस्थानी भाषा ने संविधान सु मान्यता दिलावा वास्ते करिया गया प्रयास

¸राजस्थानी भाषा रा विरोधी संकीर्ण मानसिकता वाळा
प्रस्तुति - दैनिक नवज्योति 18 अप्रेल 2010

संघर्ष समिति रो पोस्टकार्ड अभियान शुरू
जयपुर, 17 अप्रेल। राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति मायडभाषा ने प्रदेश रो अस्तित्व अर गौरव करार देवते हुवे इणरो विरोध करणे वाळा ने संकीर्ण मानसिकता सु प्रेरित बरायो है।

संघर्ष समिति लारले कई साला सु राजस्थानी भाषा ने संवैधानिक मान्यता दिलाणे ने लेर'र जनजागरण अभियान चालु कर राखियो है। अब पोस्टकार्ड अभियान ने और तेज करियो गयो है। समिति रा पूर्व अध्यक्ष भरत ओला बताया कि इण अभियान रे तहत यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी, राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटील ने पोस्टकार्ड भेज'र राजस्थानी भाषा ने संविधान री आठवीं अनुसूची में अविलम्ब मान्यता देणे री मांग करी जावेगी। ओला जी बताया कि जिण प्रदेशा री मायड भाषाया आठवीं अनुसूची में शामिल है, बठे विकास री दर आपारे अटे सु बहुत आगे है। पण विडम्बना आ है कि देश रे सबसु बडे प्रदेश राजस्थान री मायड भाषा ने आज तक संवैधानिक गौरव हासिल नीं हुयो।

दुनियाभर में 6800 भाषायां अर बोलियां
दुनियाभर री बात करी जावे तो करीब 6800 भाषाया अर बोलिया है। यदि इणारो संरक्षण नीं करियो गयो रो ए हमेशा रे वास्ते आपरो अस्तित्व खो देवेगी।

यूनेस्को भी संवेदनशील
भले ही राजस्थाणी भाषा ने संवैधानिक मान्यता ने लेर इण धरा रो अन्न-जल ग्रहण कर पलने वाळा विरोध में खडा हो, पण यूनेस्को मायड भाषःाया ने लेर'र काफी संवेदनशील है। यो हि कारण है कि यूनेस्को स्थानीय भाषायां रे संरक्षण ने लेर'र 21 फरवरी ने मातृभाषा दिवस घोषित करियो है।

प्रारंभिक शिक्षा रो मूल स्त्रोत ही मातृभाषा है
प्रस्तुति - अतुल कनक

स्वतंत्र भारत में शिक्षा ने लेर'र गठित हुवे कमोबेश सब आयोग आपरी-आपरी सिफारिशां में शुरुआती शिक्षा मातृभाषा में देणे री बात करी है। अनिवार्य शिक्षा विधेयक एक बार फेर इण आवशयकता ने रेखांकित करियो है। राजस्थान में मातृभाषा में शिक्षा रो मुद्‌दो इण वास्ते विवादित हो चलयो है कि राजस्थानियां री मातृभाषा राजस्थानी ने अभी तक संवैधानिक मान्यता नीं मिली है। मान्यता रा विरोधी राजस्थान री विविध बोलियां री स्वरूपगत विविधता ने लेर'र सवाल खडो कर रिया है कि जिण राजस्थानी रो कोई मानक स्वरूप नीं है, विने मान्यता किंया दी जाणी चाविजे। आश्चर्य यो है कि मानक स्वरूप रो सवाल विण भाषा वास्ते खडो करियो जा रियो है, जिण भाषा री राजस्थान में आपरी खुद री एक अकादमी है। केंद्रीय साहित्य अकादमी हर साल जिण भाषा में सजृनात्मक लेखण ने देश री दुजी प्रमुख शाखाया रे साथे पुरस्कृत करे है, जिण भाषा ने माध्यमिक अर उच्च माध्यमिक स्तर पर वैैकल्पिक विषय रे रूप में पढायो जावे है अर देश-दुनिया रा अनेक विश्वविधालयां में जिण भाषःा में अध्ययन और शोधकार्य हो रिया है। स्पष्ट है कि मान्यता रो  विरोध दरअसल भाषा रो विरोध नीं, स्वार्था रो विरोध है।

अमेरिकी  राष्ट्रपति रे कार्यालय राजस्थानी भाषा री क्षमता ने मान्यता विण समय दी जद, राजस्थानी भाषा ने संवैधानिक मान्यता दिलाणे री मांग आपरे चरम पर है। विसंगति आ है कि इणी राजस्थानी भाषा ने भारत रे संविधान री आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाणे री मांग दशका पुराणी होणे रे बावजूद आज तक पूरी नीं हो सकी है। डा. कन्हैया लालजी सेठिया तो 'खाली धड री कर हुवै, चैरे बिन पिछाण। मायड भाषा रे बिना क्यां रो राजस्थान केवते केवते ही हमेशा रे वास्ते मौन हुयग्या। आज राजस्थान री संसकृति रे गौरव गायक सेठिया जी रो यो दोहो राजस्थाणी री मान्यता रे संघर्ष रो प्रतिनिधि बण गयो है।

मारवाडी रे साथे ही ढूंढाणी, वागाडी, हाडौती, मेवाडी, मेवाती जेडी बोलिया आपरी तमाम उपबोलिया रे साथे राजस्थानी रे गौरव री संवाहक भी है अर पहचाण भी। बेशक राजस्थानी में बोलीगत वैविध्य है, पण या विविधता ही भाषा ने समद्ध करे है।

आपाणे मांय सु कोई भी ओ दावो कर सके है कि हिन्दी रे नाम पर आपा जिण भाषा रो उपयोग कर रिया हा, वा हिन्दी रे मानक स्वरूप री अनुगामिनी है। चेकोस्लोवाकिया रा हिन्दी रा विद्वान डा. ओदोलन स्मेकल जद पेली बार भारत आया तो बे निराशापूर्वक कहयो कि मै जिण भाषा ने सीख र अटे आयो हो, विणने सुणन वास्ते तरस गयो। दरअसल भाषाया तो नदी री तरह हुवे है। निरंतर प्रवाह वियारे स्वरूप ने प्रभावित तो करे ही है। हिन्दी रो मानक स्वरूप संस्कृतनिष्ठ है, पण आज हिन्दी में अंग्रेजी, उर्दू, अरबी, फारसी ही नहीं पुर्तगाली तक रे शब्दा रो इस्तेमाल धडल्ले सु हो रियो है। भाषा री आ लोचनशीलता ही विने व्यापक बणावे है। जटे तक राजस्थानी रे मानक स्वरूप रो सवाल है राजस्थानी रे प्राचीन ग्रन्था री भाषा आपारे वास्ते अनुकरणीय हो सके। राजस्थानी रो पेलो उपन्यास कनक सुंदर करीब एक सौ दस साल पेला हैदराबाद में छपियो हो। विणसु भी पेला 1857 में बूंदी रा राजकवि सूर्यमल्ल मिश्रण आपरे साथिया ने जिका पत्र लिखया हा वे भी करीब चार सदी पेला गागरौन रा शिवदास गाडण 'अचलदास खीची री वचनिका' नाम सु जिकी पुस्तक लिखी ही विण सब भाषायां में अदभूत साम्य है।

टाबरा ने शिक्षा घर री बोली में दी जावे:
राजाराम भादू, साहित्यकार

अनिवार्य शिक्षा कानून रे तहत मातभाषा रो अर्थ विन बोली सु है, जिणरो चलन घर में है। टाबरा ने प्रारम्भिक शिक्षा विण भाषा में दी जाणी चाविजे, जिकी घर अर समुदाय में बोली जावे है। यदि इण कानून री मूल भावना ने समझा रो राजस्थान रे संदर्भ में इणरो अर्थ यो निकळे कि आपाने प्रदेश रे गैरराजस्थानी भाषा-भाषी क्षेत्रा अर समुदाया रो भी ख्याल रखणो चाहिये। जिया कि भरतपुर अर अलवर रे ब्रज क्षेत्र में टाबरा ने ब्रज में ही शिक्षा दी जावे है। इणी तरह दक्षिण राजस्थान रे टाबरा रे वास्ते वागडी उपयुक्त रेवेगा।

पंजाब सु सटा इलाका श्रीगंगानगर अर हनुमानगढ जिला में पंजाबी भी शुरूआती शिक्षा रो माध्यम हो सके है। इणि तरह दूजा स्थाना पर भी ध्यान रखियो जाणो चाहिजे। सही बात तो या है कि वर्चस्व रे आधार पर भाषा रा मसला तय नीं होवे है। इयाने लोकतान्त्रिक प्रक्रिया सु हि हल करियो जा सके है। इणमे असहमतिया ने दबाणो कतई उचित नीं है। अगर आपा टाबरा ने घरेलू अर सामुदायिक नजरिये सु देखा तो राज्य में दर्जनो बोलिया प्रयुक्त होवे है अर बियारो आपरो महत्व है। इयामें मारवाडी, ढ़ुंढ़ाडी, शेखावाटी, मेवाडी, ब्रज, मेवाती आदि भाषाया है। डांग, राठ अर सहरिया क्षेत्रा री आपरी खुद री बोलियां है।

राजस्थानी ने सोवियत रुस समझियो, आपा नीं

रूसी विद्वान बोरिस आई.क्लूयेव चार दशक पेला करियो राजस्थानी भाषा पर अनुसंधान
राजस्थानी भाषा रे गौरव अर समृद्धि री अहमियत ने रूस जेडो मोटोे देश तक समझियो पण  आपा नीं समझ पाया। तत्कालीन सोवियत रुस रा लेखक बोरिस आई.क्लूयेव सहित कई विद्वान 70 रे दशक में राजस्थानी भाषा पर शोध कर इणरे समग्र स्वरूप ने मान्यता देणे री वकालत करी। बोरिस राजस्थनी री अनेक बोलिया पर आपरे शोध में कह्यो कि राजस्थान में भाषा स्थिति इतरी जटिल नी है जिती पेली बार में दिखे है। इणरे अलावा राजस्थानी री आंचलिक बोलियां रे आधार पर राजस्थानी रे स्वरूप ने बिगडनने अर इणमे विभेद पैदा करणे री कोशिशा ने भी गलत बताया है।

बोरिस आई.क्लूयेव ने स्वतंत्र भारत
जातिय अर भाषाई समस्या विषय पर शोध शुरू करियो तो बियाने राजस्थानी बहोत प्रभावित करी बे राज्स्थानी में संजाति-भाषायी प्रक्रियायां शोध में साफ लिखयो, राजस्थानी री अनेक बोलियां में सु ज्यादातर एक ही बोली समूह री है। इण बोलियां री पुराणी साहित्यिक परंपरायां है।

प्राचीन मरू भाषा सु डिंगल रे साहित्य और सु अब तक राजस्थानी हि साहित्यिक भाषा रो प्रमुख पडाव तय करियो है। 1961 री भाषायी जनगणना रे अनुसार राजस्थानी ने आपरी मातृभाषा बताणे वाळा री संख्या 1.50 करोड ही। राजस्थानी बोलण वाळा री संख्या राजस्थान सु बारे भी बहोत है। 1961 री जनगणना में भाषाई गणना रे हिसाब सु भारत री प्रमुख भाषाया रे क्रम में इने 12 वे पायदान पर राख्यो गयो। इणमे राजस्थान में रेवण वाळा 80% लोगा री मातृभाषा राजस्थानी है।

रूसी शोध में भी मान्यता रो मुद्‌दो प्रमुख हो।

राजस्थानी भाषा ने आठवीं अनुसूची में शामिल करणे री मांग रो जिक्र रूसी विद्वान रे शोध में भी हो। राजस्थानी ने 60 रे दशक सु राजभाषा री मान्यता देणे री मांग उठाई जा रई है।

आपारे टाबरा रो हक मायड भाषा में हो पढाई
दैनिक भास्कर शनिवार, 10 अप्रैल 2010

वोट मांगणे री भाषा राजस्थानी तो पढ़ाई री क्यु नीं।

समाज रे कई तबका सु जुडयोडा अग्रणी लोगा रो माननो है कि मायड भाषा टाबर मां री कोख सु सीख'र आवे है, आ बिरे रगा में खुन रे जरिये दौडे है अर बी भाषा में हि टाबर चीजा ने बेहतर तरीके सु जान-समझ सके है। इया में राजस्थान रे टाबरा री प्राथमिक शिक्षा रो माधयम मायड भाषा राजस्थानी हि होणो चाहिये।

शुक्रवार ने भास्कर कार्यालय में भेळा हुया प्रदेश व देश रा नामी गिरामी साहित्यकार, शिक्षाविद, विधिवेता, अभिवावक सहित अन्य वर्गा रा प्रतिनिधि एक स्वर में कियो, राज्स्थानी में पढणो आपरे टाबरा रो हक है अर यो हक आपा लेर रेवांगा। अनिवार्य शिक्षा कानून में प्राथमिक पढ़ाई रो माध्यम मायडभाषा ने बताणे रो प्रावधान रो जठे भी स्वागत कियो बढे राज्य रा शिक्षामंत्री रीे ओर सु फिलहाल राज्य में हिन्दी ही मातृभाषा केवे जाणे पर कडी आपत्ति जताई अर इने हास्यास्पद बयान कहयो। आक्रोश जताते हुवे साहित्यकारां कह्यो, शिक्षामंत्री सहित राज्य रा लगभग सब नेता वोट मांगते समय गांवा में जार मायड भाषा राजस्थानी में बात करे है।

भले हि दिल्ली आठवीं अनुसूची में राजस्थानी ने शामिल नीं करियो पण मातृभाषा ने जन मान्यता है अर इणसु मोटी कोई मान्यता दूजी नीं होवे। मातृभाषा में अभिव्यक्ति स्शक्त नीं मानी जावती तो साक्षरता अभियान री आखर गंगा गांव-गांव तक इण भाषा रे जरिये ही किया पुगती। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हि लारले कार्यकाल में संकल्प पारित कर राजस्थानी ने मानता दिलाणे री बात केवी अब टेम आय गियो है कि बियाने इण मुद्‌दे पर गंभीरता सु काम करते हुए दिल्ली में दृढता सु बात रखणी चाहिये।

राजस्थानी ने बचाणो जरूरी
भास्कर, 12 अप्रेल 2010

प्रदेश में प्राथमिक कक्षआया में राजस्थानी ने सरल भाषा रे रूप में अपनाए जाणे पर राज्य रा मंत्री अर पूर्व मंत्री सहमत है, पण इणसु प्व्ली वियाणो जोर इण बात पर है कि पेली राजस्थानी भाषा ने संवैधानिक मानता मिले। इण राजनेताओ रो यो भी केवणो है कि अलग-अलग क्षेत्रा में राजस्थानी भाषा अलग-अलग लहजे में बोली जावेगी, इण वास्ते सरकार राजनीतिक स्तर पर इण बात रो निर्धारण हो कि राजस्थानी भाषा रो स्वरूप कांई होवेगो। इणने संविधान री आठवीं अनुसूची मांय शामिल करआणे रे वास्ते राज्य सरकार केन्द्र सरकार ने संकल्प पारित कर भेज चुकी है।

कोटा संभाग सु आणे वाळे ग्रामीण विकास मंत्री भरतसिंह जी री चिंता या है कि बियारे क्षेत्र में लोग मातृभाषा ने हि भूलण लाग रिया है अर सामान्य बोलचाल मांय अंग्रेजी घर कर लियो है।

शिक्षा म्हारो अधिकार

भास्कर मुद्‌दो - मातभाषा राजस्थानी क्यु नीं?

राजस्थानी ने मानता दो
"म्हे राजस्थानी ने आगे बढ़ाणे रा पक्षधर हा। या संविधान री आठवीं अनुसूची में शामिल हो जावे तो सब काम अपने आप हो जावेगा।"
बी.डी.कल्ला, पूर्व शिक्षा मंत्री

"टाबर मायड भाषःआ ने ज्याद आ सीखे है अर पढ़ाई रो माध्यम भी ओ हि रेणो चाहिये। म्हारे शिक्षा आ मंत्री रेवते हुवे प्रारम्भिक शिक्षा में राजस्थानी ने शामिल करणे री मांग ने लेर एक बार प्रतिनिधि मंडल मिलयो हो, इण रे बाद कोई नीं आयो।"
घनश्याम तिवाडी, पूर्व शिक्षा मंत्री

"अबार ओ तय नीं हो पायो है कि राजस्थानी भाषा किने केवणो चाहिजे, क्युकि हर क्षेत्र में अलग-अलग बोलियां है। मुख्य मंत्री अर सरकार इण बारे में कोई निर्णय लेवे तो इणरे बाद स्कूला में लागू करणे री बात आवेगी।"
हेमाराम चौधरी, राजस्व मंत्री

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